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पं. दिव्य नारायण शास्त्री जी 

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सुदामा जी के पिता का क्या नाम है sudama ji ke pitaji ka kya naam tha

सुदामा जी के माता पिता कौन थे?   प्रेम क्या है? प्रेम की परिभाषा क्या है? सुदामा जी एक निर्धन ब्रम्हण थे जिन्होंने अपना जीवन श्री कृष्णा के चरणों मे समर्पित कर दिया था उनके पिता थे शरडधार और माता का नाम सत्यबती था और उनकी पत्नी का नाम सुसीला देवी था  सुदामा जी का घर अस्मावतीपुर (पोरबन्दर) मे था, सुदामा जी के परम् मित्र श्री कृष्ण थे और इनके गुरू जी का नाम संदीपनी मुनी था  श्री कृष्ण ने और सुदामा जी बलराम ने साथ उज्जैन में शिक्षा ग्रहण किये जब भी हम आदर्श मित्रता की बात करते हैं, सुदामा और श्री कृष्ण का प्रेम स्मरण हो आता है। एक ब्राह्मण, भगवान श्री कृष्ण के परम मित्र थे। वे बड़े ज्ञानी, विषयों से विरक्त, शांतचित्त तथा जितेन्द्रिय थे।  वे गृहस्थी होकर भी किसी प्रकार का संग्रह परिग्रह न करके प्रारब्ध के अनुसार जो भी मिल जाता उसी में सन्तुष्ट रहते थे।  उनके वस्त्र फटे पुराने थे। उनकी पत्नी के वस्त्र भी वैसे ही थे। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। नाम के अनुसार वह शीलवती भी थीं।  वह दोनों भिक्षा मांगकर लाते और उसे ही खाते लेकिन यह बहुत दिन तक नहीं चल सका। कुछ वर्षों के बाद

जीवन का सत्य क्या है? Jeevan ka Satya kya hai?

मनुष्य जीवन का सत्य क्या है? Satya kya hai?  सत्य केवल एक ही है ब्रह्म ही सत्य है और ब्रह्म से अलग कोई दूसरा सत्य नही है। और सत्य ही ब्रह्म है जैसे जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु और मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नही होता है लेकिन प्राणी इस अटल सत्य को मानता नही है और कोशिश करता रहता है कि वह मृत्यु से बच जायेगा किन्तु वह नही बच पाता है। इसी प्रकार आत्मा भी सत्य है और आत्मा कभी नही मरती मरता तो प्राणी का शरीर है आत्मा तो अमर है आत्मा तो परमात्मा परब्रह्म का अंश हैै मनुष्य जीवन का सत्य क्या है ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन विमल सहज सुख राशी | सो माया वश भयो गोसाईं बंध्यो जीव मरकट के नाहीं || और जब ब्रह्म का अंश है तो वह मर कैसे सकता है उसे तो भगवान भी नही मार सकते क्यो कि अंश तो ब्रह्म का है  बल्ब को प्यूज होने के बाद फेक दिया जाता है उसी प्रकार जब इस देह को आत्मा त्याग कर जाति है तो देह जला दिया जाता है। बल्ब खुद नही जलता उसे जलाता है उसके अंदर रहने बाला तार उसी प्रकार शरीर नही चलता उसे चलाता है आत्मा और आत्मा सत्य है कभी मरती नही है और भी कभी मरता नहीं है बस केवल सत्य का रूप स्वरूप बदल

नर्क कितने प्रकार के होते हैं?Nark kitne prakar ke hote hai

न र्क कितने प्रकार के होते हैं? धार्मिक मान्यता अनुसार नरक वह स्थान है जहां  पापियों की आत्मा दंड भोगने के लिए भेजी जाती है। दंड के बाद कर्मानुसार उनका दूसरी योनियों में जन्म होता है। कहते हैं कि स्वर्ग धरती के ऊपर है तो नरक धरती के नीचे यानी पाताल भूमि में हैं। इसे अधोलोक भी कहते हैं। अधोलोक यानी नीचे का लोक है। ऊर्ध्व लोक का अर्थ ऊपर का लोक अर्थात् स्वर्ग। मध्य लोक में हमारा ब्रह्मांड है। सामान्यत: 1.उर्ध्व गति, 2.स्थिर गति और 3.अधोगति होती है जोकि अगति और गति के अंतर्गत आती हैं। कुछ लोग स्वर्ग या नरक की बातों को कल्पना मानते हैं तो कुछ लोग सत्य। जो सत्य मानते हैं उनके अनुसार मति से ही गति तय होती है कि आप अधोलोक में गिरेंगे या की ऊर्ध्व लोक में। हिन्दू धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि गति दो प्रकार की होती है 1.अगति और 2. गति। अगति के चार प्रकार है- 1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति।... और गति में जीव को चार में से किसी एक लोक में जाना पड़ता है। गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं: 1.ब्रह्मलोक, 2.देवलोक, 3.पितृलोक और 4.नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्