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श्री कृष्ण ने द्रोपदी का चीर कैसे बढाया? panch pandav

श्री कृष्ण ने द्रोपदी का चीर कैसे बढाया? 

Shri krishna ne dropadi ka chir kaise badaya? panch pandav,

द्रोपदी स्वयंवर

द्रोपदी का जन्म कहा हुआ-

द्रोपदी पांचाल राज्य मे हुआ  राजा द्रुपद कि पुत्री थी जिसका जन्म यज्ञ के हवन कुंड से हुआ था, इसी लिए द्रोपदी का एक नाम याज्ञशेनी भी था जब द्रोपदी का स्वयंवर हुआ तो उस स्वयंवर मे अंगराज कर्ण भी आये थे और हस्तिनापुर से राजकुमार दुर्योधन भी थे भेस बदलकर भिक्षा मागने कि इक्षा से आये हुए थे पांडव जव अंगराज कर्ण को अपमानित किया गया कि वे सूत पुत्र है फिर किसी से भी वह लक्ष्य भेद नही हुआ तव अर्जुन ने उस लक्ष्य भेद किया और स्वयंवर को जीत कर द्रोपदी को लेकर चले गयेे। 

पांडवो कि माता के वो बचन जिनसे द्रोपदी पांचाली बनी

और फिर जव अपनी माता के पास गये तो धर्मराज युधिष्ठिर ने माता से कहा कि हमे भिक्षा मे क्या मिला है देखा मॉ तो मॉता पूजा मे बैठी थी और मॉ ने कहा जोभी मिला है वह तुम पांचो आपस मे बांट लो फिर जब मॉता ने देखा कि अर्जुन ने स्वयंवर जीत कर द्रोपदी को लाये है तो वो मन मे ग्लानी करने लगी और कहा की मेरा बचन मत मानो लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि मॉ का बचन असत्य नही हो सकता इसी लिए हम पांचो को विवाह करना होगा द्रोपदी से तब फिर पांचो भाइयो ने द्रोपदी से विवाह किया और वन मे रहने लगे, panch pandav,

पांडवो का इन्द्रप्रस्त मे राज्य कैसे मिला

कुछ समय वीतने के बाद जब वन से लोटे तब हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्त का बटवारा हुआ और इन्द्रप्रस्त धर्मराज को देदिया गया फिर एक दिन मामा सकुनी ने दुर्योधन से कहा कि इन्द्रप्रस्त भी धर्मराज युधिष्ठिर ने छीन लेते है छल से द्युत क्रिडा कि योजना 

द्युत क्रिडा का निमंत्रण

बनाई और इन्द्रप्रस्त निमंत्रण भेजा धर्मराज युधिष्ठिर के पास और जव द्युत क्रिडा चालू हुई तब फिर धर्मराज सब कुछ धिरे धिरे हारने लगे लास्ट मे जब कुछ भी नही बचा तो द्रोपदी को भी दाव पर लगा दिए द्रोपदी को हारने के बाद जब 

द्रोपदी चीर हरण


द्रोपदी का चीर हरण

द्रोपदी को दुशासन कक्ष से बाल पकड कर लाया उस समय द्रोपदी रस्वला थी और दुर्योधन ने कहा कि इसे मेरी जंघा पर बैठाओ जब दुशासन द्रोपदी का चार हरण करने लगा तब सब लोग मोन थे किसी ने कुछ नहीं कहा और द्रोपदी ने अपने मोहन कृष्ण से पुकारा लगाई तब भगवान कृष्ण ने द्रोपदी का चीर बडाया और उस अपमान से द्रोपदी को बचाया ।
क्यो की जब मनुष्य का साथ सब छोड़ देते हैं तो भगवान उनकी मदत करते हैं, और भगवान ने द्रोपदी को भी बचाया और उसके मान को भी।

द्युत क्रिडा की सर्ते

जब धर्मराज युधिष्ठिर द्युत क्रिडा हार गए तब कुछ सर्ते रखी गई कि जो हारेगा उसे बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञात वास पूरा करना होगा, और अगर अज्ञात वास मे पकडे गए तो दोवारा बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञात वास पूरा करना होगा।
जब विराट नगर मे अज्ञात वास पूरा हुआ तब दुर्योधन ने राज्य देने से मना कर दिया और फिर महाभारत का विसाल युद्ध हुआ जिसमे सहस्त्रो सेनिको ने अपना वलीदान दिया
धर्म कि स्थापना के लिए। धर्म कि स्थापना के लिए कोई प्राण भी पागे तो देदेना चाहिए।


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