Skip to main content

श्री मद्भभागवत भक्ति योग क्या है? Bhagvat kya hai?

भागवत क्या है? भागवत कहा से आई है?  Bhagvat kya hai? 

श्री मद् भागवत पुराण


भगवतःप्रोक्तं भागवतम् -

जो भगवान श्री नारायण के मुख से जिसका अवतरण हुआ है वही भागवत है । भागवत मे भक्ति योग का विसतार से वर्णन किया गया है श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परिक्षित  को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति, सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है।

श्री मद् भागवत की रचना श्री वेदव्यास जी ने कि है और फिर  शुकदेव जी को दी गई शुकदेव जी द्वारा अन्य मुनियों को प्राप्त हुई। भागवत मे १२स्कन्ध ३३५अध्याय १८००० श्लोक हैं ।

भागवत मे भगवान के मुधुर चरित्रो का वर्णन है भगवान ने भागवत मे प्रेम को ही सर्वश्रेष्ठ बाता है । भगवान ने भक्ति योग और ज्ञान योग एवं कर्म योग  का भी मार्ग भागवत मे बताया है।

भक्ति योग क्या है? 

भक्ति योग-

यह योग भावनाप्रधान और प्रेमी प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए उपयोगी है। वह ईश्वर से प्रेम करना चाहता है और सभी प्रकार के क्रिया-अनुष्ठान, पुष्प, गन्ध-द्रव्य, सुन्दर मन्दिर और मूर्ति आदि का आश्रय लेता और उपयोग करता है। प्रेम एक आधारभूत एवं सार्वभौम संवेग है। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से डरता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसे अपने जीवन से प्रेम है। यदि कोई व्यक्ति अधिक स्वार्थी है तो इसका तात्पर्य यह है कि उसे स्वार्थ से प्रेम है। किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी या पुत्र आदि से विशेष प्रेम हो सकता है। इस प्रकार के प्रेम से भय, घृणा अथवा शोक उत्पन्न होता है। यदि यही प्रेम परमात्मा से हो जाय तो वह मुक्तिदाता बन जाता है। ज्यों-ज्यों ईश्वर से लगाव बढ़ता है, नश्वर सांसारिक वस्तुओं से लगाव कम होने लगता है। जब तक मनुष्य स्वार्थयुक्त उद्देश्य लेकर ईश्वर का ध्यान करता है तब तक वह भक्तियोग की परिधि में नहीं आता। पराभक्ति ही भक्तियोग के अन्तर्गत आती है जिसमें मुक्ति को छोड़कर अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। भक्तियोग शिक्षा देता है कि ईश्वर से, शुभ से प्रेम इसलिए करना चाहिए कि ऐसा करना अच्छी बात है, न कि स्वर्ग पाने के लिए अथवा सन्तति, सम्पत्ति या अन्य किसी कामना की पूर्ति के लिए। वह यह सिखाता है कि प्रेम का सबसे बढ़ कर पुरस्कार प्रेम ही है और स्वयं ईश्वर प्रेम स्वरूप है। पति-पत्नि के प्रेम मे भगवान का स्वरूप है माता पुत्र को जब स्थन पान कराती हैं तब उनके प्रेम मे भीभगवान का ही स्वरूप है। भगवान जब हर व्यक्ति हर प्राणिमात्र मे जब भगवान दिखने लगे तो वही भक्ति योग हैै ।

कर्म योग क्या है? 

कर्म योग-

वास्तव में कर्मयोग ही वह योग है जिसके माध्यम से हम अपनी जीवात्मा से जुड़ पाते हैं। कर्मयोग हमारे आत्मज्ञान को जागृत करता है। इसके बाद हम न केवल अपने वर्तमान जीवन के उद्देश्यों को बल्कि जीवन के बाद की अपनी गति का पूर्वाभास प्राप्त कर सकते हैं।

इस योग में कर्म के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गृहस्थ और कर्मठ व्यक्ति के लिए यह योग अधिक उपयुक्त है। हममें से प्रत्येक किसी न किसी कार्य में लगा हुआ है, पर हममें से अधिकांश अपनी शक्तियों का अधिकतर भाग व्यर्थ खो देते हैं; क्योंकि हम कर्म के रहस्य को नहीं जानते। जीवन के लिए, समाज के लिए, देश के लिए, विश्व के लिए कर्म करना आवश्यक है।

किन्तु यह भी एक सत्य है कि दु:ख की उत्पत्ति कर्म से ही होती है। सारे दु:ख और कष्ट आसक्ति से उत्पन्न हुआ करते हैं। कोई व्यक्ति कर्म करना चाहता है, वह किसी मनुष्य की भलाई करना चाहता है और इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि उपकृत मनुष्य कृतघ्न निकलेगा और भलाई करने वाले के विरुद्ध कार्य करेगा। इस प्रकार सुकृत्य भी दु:ख देता है। फल यह होता है कि इस प्रकार की घटना मनुष्य को कर्म से दूर भगाती है। यह दु:ख या कष्ट का भय कर्म और शक्ति का बड़ा भाग नष्ट कर देता है।

ज्ञान योग क्या है? 

ज्ञान योग- 

एक रूप में ज्ञानयोगी व्यक्ति ज्ञान द्वारा ईश्वरप्राप्ति मार्ग में प्रेरित होता है। वेदव्यास द्वारा रचित श्री मद् भागवत मे ज्ञानयोग का मायावाद,मनुष्य का यथार्थ व प्रकृत स्वरूप,माया और मुक्ति,ब्रह्म और जगत,अंतर्जगत,बहिर्जगत,बहुतत्व में एकत्व,ब्रह्म दर्शन,आत्मा का मुक्त स्वभाव आदि नामों से उनके द्वारा दिये भाषणों का संकलन है।
अब यदि विश्लेषण किया जाये तो वास्तव में ज्ञान योगी मायावाद के असल तत्व को जानकर,अपनी वास्तविकता और वेदांत के अद्वैत मत के अनुरूप आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानकर मुक्ति प्राप्त करता है

प्रेम क्या है? 

प्रेम सार-

श्री मद् भागवत मे ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग, के साथ प्रेम का भी बहुत महत्व है प्रेम ही श्रष्टी का आधार है प्रेम की वजह से ही माता के गर्भ मे जब शिशु आता है तो वह माता को बहुत कष्ट देता है परन्तु जब जन्म होता है तो माता उसे करुणा से ही देखती है प्रेम ही है जो श्रष्टी को चलाय मान करता है।। 

Comments

Popular posts from this blog

सृष्टि कि उत्पत्ति कैसे हुई?srasti ki utppi kaise hui?

सृष्टि कि उत्पत्ति कैसे हुई?  सकल जग हरि कौ रूप निहार।हरि बिनु बिस्व कतहुँ कोउ नाहीं, मिथ्या भ्संसार।।अलख-निरंजन, सब जग ब्यापक, सब जग कौ आधार।नहिं आधार, नाहिं कोउ हरि महँ, केवल हरि-बिस्तार।।  अखिल ब्रह्माण्ड नायक कि सृष्टि कि सुन्दरता इतनी है कि कोई और करीगर एसी करिगरी नही कर सकता  एक प्रकार से कहा जाये तो मनुष्यो और जीव-जन्तूओ के लिए पांच सितारा बाला होटल है ये संसार परंतू मनुष्य इसे अपने तरीके से बदल रहा है  भगवान कहते हैं -मेने मानुष जनम तुमको हीरा दिया,तू व्यर्थ गवाए तो मे क्या करू|
वेद-वेदान्तो मे सब बता ही दिया,
तेरी समझ में ना आये तो मे क्या करू ||
अन्न फल दूध धी भी तुमको दिया,
मेवा मिष्टान भी मेने पैदा दिया ||
हत्यारा हो जीभ के स्वाद में |
तू अगर मान्स खाए तो मे क्या करू ||
यह अनंत ब्रह्माण्ड अलख-निरंजन परब्रह्म परमात्मा का खेल है। जैसे बालक मिट्टी के घरोंदे बनाता है, कुछ समय उसमें रहने का अभिनय करता है और अंत मे उसे ध्वस्त कर चल देता है। उसी प्रकार परब्रह्म भी इस अनन्त सृष्टि की रचना करता है, उसका पालन करता है और अंत में उसका संहारकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही उसकी क्रीडा है,…

सत्य क्या है? satya kya hai?

सत्य क्या है? ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्यम्


ब्रह्म ही सत्य है बकी सारा जगत मिथ्या है, उस संसार में परम पिता परमात्मा ही सत्य है वाकी सारा जगत मिथ्या है एक मात्र शाश्वत सत्य मृत्यू ही है इस संसार में जोभी कुछ है वह सब कुछ झूठ है और यह संसार परमात्मा का रंग मंच है और हम उनके खिलौने है जिस प्रकार बच्चे थिलौनो से खेलते है
 और फिर जब मन भर जाता है तो उन्हे तोड देते हैं उसी प्रकार ब्रह्म भी खेलते है और मन भर जाता है तो संसार का प्रलय कर देते हैं
भगवान का यह संसार कृणा स्थल है जहा प्रभू खेलते है और मनुष्य जब कोई गलती करता है और पाप करता है तो भगवान हसते है कि मेने तुम्हे संसार में तुम्हें धर्म कर्म करने के लिए भेजा था और तुम ये सब पाप कर रहे हो हमे पाप का मार्ग छोड के पुण्य का मार्ग अपनाना चाहिए परमात्मा ने हमे 84लाख योनियो मे सबसे श्रेष्ठ मनुष्य का जन्म दिया
और हम इस सरीर को व्यर्थ गवा रहे हैं हमे जब और अच्छी चीज फ्री मे मिलती है तो हमे उसका उपयोग बहुत अच्छे से करना चाहिए और हमे तो बहुत ही कीमती शरीर मिला है
 जो देवताओ को भी दुर्लभ है
बडें भाग्य मानुष तनपावा
 सुरदुर्लभ सब ग्रंथन गाबा
वह शरीर मिला…

ब्रह्म क्या है? कोन है? brahm kya hai?

ब्रह्म क्या है? कोन है?
ब्रह्म एक सून्य के समान है जो अपने आप मे पूर्ण है जिस प्रकार किसी अंक के पीछे सून्य लग जाने से उस अंक कि किमत बढ जाजी है उसी प्रकार ब्रह्म है | ब्रम्ह कि जरूरत सब को है परंतू ब्रह्म को किसी जरूरत नही है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सून्य कि जरूरत अंको को है
 mahavishnu  सून्य को किसी कि जरूरत नही है | परब्रह्म एक सून्य के समान है ब्रह्म हर जगह है इशा वाशं जगत सर्वं इश्वर का वाश सारे जगत मे है हर प्राणी मे इश्वर है वही इश्वर जो जगत मे हमे रहने कि भोजन कि व्यवस्था देते हैं
srashthi ki utpatti सृष्टि कि उत्पत्ति कैसे हुई? परमात्मा का उपकार हमे पुन्य करके चुकान चाहिए लेकिन हम पुण्य करने कि जगह पाप कि पाप कर रहे हैं  माया माया सब भजे माधव भजे ना कोई|
 जो एक बार माधव भजे माया चेली होये || तो पैसा पैसा तो सब बोलते हैं पर भगबान का नाम कोई नहीं लेता है लेकिन एक बार सच्चे मन से भगबान का नाम लेलिया ना तो माया भी पीछे पीछे घूमेगी |  प्रेम क्या है?|Prem kya had? हमे दिन भर में दस मिनट तो भगवान का नाम लेना चाहिए इस काम से भगबान तो प्रशन्न होते ही है और मन भी शांत रहता है

सृष्टि के …