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परमात्मा कोन है?parmatma kon hai?

परमात्मा कोन है? 
विराट स्वरूप 

इस धरती पर जन्म लेते ही ,हम किसी ना किसी धर्म के अनुयायी हो जाते है , वो जन्मजात संस्कार की घुट्टी हमें हमारे परिवार द्वारा पीला दी जाती है,
की हमें किसकी पूजा करनी है किस भगवान ,पीर,पैगम्बर,मसीहा,देवदूत,देवता को मानना और पूजना है.
कुछ बड़े होने पे विवेक से या स्वार्थ से लोग अपना धर्म भी परिवर्तित कर लेते है और फिर दूसरे भगवानो,मूर्तियों,पैगम्बरो,या देवदूतों को पूजने लग जाते है.
परन्तु क्या वो जिसे पूज रहे है क्या उसका "अस्तित्व" है इस सृष्टि में ???

1.हिन्दू तरह-तरह के देवी देवता और अलग अलग भगवान् को पूजते है

2.मुस्लिम अल्लाह को तो मानते है साथ ही साथ पीर,पैगम्बर ,दरगाह ना जाने और क्या- क्या?

3.ईशाई युसु,मरियम,यहोवा और भी......
इसी प्रकार जैन ,बौद्ध, और भी धर्म के लोग ना जाने कितनो को पूजते है...

और इसी प्रकार सबके अपने अपने अस्तित्व वाले भगवान!
ऐसे लोगो को या, ये कहे की सभी को पता है की हम सबको जन्म देने वाला परमेश्वर एक ही है,और वो अलग हो भी नहीं सकता

परन्तु फिर भी अज्ञानतावस या स्वार्थवस लोग एक परमात्मा को नहीं पूजते.
और अगर सभी को पता भी है की परमात्मा एक ही है, तो क्या वो इस भाव से पूजता भी है ! मेरा तो मानना "नहीं " ही है,

क्योंकी अगर ऐसा होता तो आज धर्म के नाम पे समाज का बटवारा ना हुआ होता,नहीं आपसी विवाद बढ़ते.

परमात्मा है कौन ???
"एको अहम् द्वितीयो नास्ति"

सनातन वेद और गीता ,कुरान , बाइबल,गुरुग्रंथसाहिबा सब यही कहते है- "परमात्मा एक है "
जिसे वेदो ने- अजन्मा,अमित,मायापति, निरंकार कहा.
कुरान ने- अल्लाह कहा जिसका कोई स्वरुप नहीं ,जो हर जगह है.
जिसको संतो ने हरी या शिव कहा,या राम ,कृष्णा कहा वो ही परमात्मा है जो निरंकार है.

लेकिन हम अज्ञान या स्वार्थ द्वारा भ्रमित हो गए
और लगे अलग- अलग स्वरुप की मुर्तिया बना के बिना सच्चे भाव के परमात्मा का स्वार्थ पूर्ति हेतु कर्मकांड द्वारा पूजा करने लगे ....वाह रे इंसान
और इसमें भी हमें समाज के पाखंडियोने अपने पेट भरने के जुगाड़ के लिए हमें और बहका दिया ,हम और उलझते गए.
गोस्वामीतुलसीदास जी ने लिखा- "हरी अनंत हरी कथा अनंता ,कहहि सुनई बहु विधि सब संता"
यानि परमातमा जो निरंकार है ,जिसका कोई रूप नहीं ,जो हम जीवो का रूप बनता है ,जो हर गुणों से परिपूर्ण है . ऐसे परमाता को भक्त जन ,
तथा संत और तत्वदर्शी अलग -अलग नामो से जानते है ,उनके अलग-अलग गुणों का बखान करते है .परन्तु वो परमात्मा जो निरंकार है ,सर्वात व्याप्त है वो एक है ,कोई दूसरा नहीं.
उसी परमात्मा को ज्ञानी निरंकार रूप में पूजते है ,भक्त उसी परमात्मा को जान के, प्रेम वस् और सहजता के लिए कोई भी एक सुन्दर रूप में गांठ के पूजता है.
परनतु अज्ञानियों की तरह भावना नहीं होती ,उनमे बस यही भावना होती है की जिसे मै पूज रहा हु वो वही अजन्मा ,निरंकार परमात्मा है.

तुलसी जी उसी एक निरंकार परमात्मा के बारे में कहते है, की- "तुलसी मस्तिक तबइ झुके जब धनुष बाण हो हाथ."
यानी निरंकार परमात्मा के सब रूपों में से तुलसी जी को सिर्फ राम रूप ही प्रिय लगा,वैसे ही सूरदास जी को सिर्फ और सिर्फ बालरूप के कृष्ण प्रिय लगे.
परन्तु भक्तो का भाव निरंकार परमात्मा के प्रति था ,उनका स्नेह उस निरंकार परमात्मा के प्रति था ,रूप तो सिर्फ एक साधन मात्र था.
तो तात्पर्य ये है कि परमात्मा एक है निरंकार ज्ञानीजन उसे उसी सत्य के साथ पूजते है ,परन्तु कुछो को बैशाखी का सहार चाहिए होता है.
या यु कहे प्रीत के लिए स्वरुप चाहिए होता है तो वो उसे उसी स्वररूप में ही पूजते है..

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