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श्रीमद्भागवतजी मे कितने छन्दो का प्रयोग किया गया है?

  श्रीमद्भागवतजी मे कितने छन्दो का प्रयोग किया गया है?               शास्त्रकारों ने द्विजातियों के लिये छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों के अध्ययन का आदेश दिया है । उन्ही अंगों में से छन्द भी एक अंग है । इन्हें वेदों का चरण माना गया है - “छन्दः पादौ तु वेदस्य ।” (पा.शि. 41) “अनुष्टुभा यजति , बृहत्या गायति , गायत्र्या स्तौति ।” (पिं. सूत्रवृत्ति अ.1) अर्थात अनुष्टुप् से यजन करे , बृहती छन्द द्वारा गान करे , और गायत्री छन्द से स्तुति करे । इत्यादि विधियों का श्रवण होने से छन्द का ज्ञान परम आवश्यक सिद्ध होता है। छन्द न जानने से प्रत्यवाय भी होता है य जैसा कि छान्दोग ब्राह्मण का वचन है - “ यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतविनियोगेन ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स स्थाणुं वच्र्छति गर्तं वा पद्यते प्रमीयते वा पापीयान् भवति यातयामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति ।”(पिं. सूत्रवृत्ति अ.1) अर्थात् जो ऋषि, छन्द, देवता, तथा विनियोग को जाने बिना ब्राह्मणमन्त्र से यज्ञ कराता और शिष्यों को पढ़ाता है, वह ठूंठे काठ के समान हो जाता है , नरक में गिरता है , वेदोक्त आयु का पूरा उपभोग न करके बीच में ही मृत्य
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जीवन का सत्य क्या है? Jeevan ka Satya kya hai?

मनुष्य जीवन का सत्य क्या है? Satya kya hai?  सत्य केवल एक ही है ब्रह्म ही सत्य है और ब्रह्म से अलग कोई दूसरा सत्य नही है। और सत्य ही ब्रह्म है जैसे जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु और मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नही होता है लेकिन प्राणी इस अटल सत्य को मानता नही है और कोशिश करता रहता है कि वह मृत्यु से बच जायेगा किन्तु वह नही बच पाता है। इसी प्रकार आत्मा भी सत्य है और आत्मा कभी नही मरती मरता तो प्राणी का शरीर है आत्मा तो अमर है आत्मा तो परमात्मा परब्रह्म का अंश हैै मनुष्य जीवन का सत्य क्या है ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन विमल सहज सुख राशी | सो माया वश भयो गोसाईं बंध्यो जीव मरकट के नाहीं || और जब ब्रह्म का अंश है तो वह मर कैसे सकता है उसे तो भगवान भी नही मार सकते क्यो कि अंश तो ब्रह्म का है  बल्ब को प्यूज होने के बाद फेक दिया जाता है उसी प्रकार जब इस देह को आत्मा त्याग कर जाति है तो देह जला दिया जाता है। बल्ब खुद नही जलता उसे जलाता है उसके अंदर रहने बाला तार उसी प्रकार शरीर नही चलता उसे चलाता है आत्मा और आत्मा सत्य है कभी मरती नही है और भी कभी मरता नहीं है बस केवल सत्य का रूप स्वरूप बदल

श्री मद्भभागवत भक्ति योग क्या है? Bhagvat kya hai?

भागवत क्या है? भागवत कहा से आई है?  Bhagvat kya hai?  श्री मद् भागवत पुराण भगवतःप्रोक्तं भागवतम् - जो भगवान श्री नारायण के मुख से जिसका अवतरण हुआ है वही भागवत है । भागवत मे भक्ति योग का विसतार से वर्णन किया गया है श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परिक्षित  को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति, सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है। श्री मद् भागवत की रचना श्री वेदव्यास जी ने कि है और फिर  शुकदेव जी को दी गई शुकदेव जी द्वारा अन्य मुनियों को प्राप्त हुई। भागवत मे १२स्कन्ध ३३५अध्याय १८००० श्लोक हैं । भागवत मे भगवान के मुधुर चरित्रो का वर्णन है भगवान ने भागवत मे प्रेम को ही सर्वश्रेष्ठ बाता है । भगवान ने भक्ति योग और ज्ञान योग एवं कर्म योग  का भी मार्ग भागवत मे बताया है। भक्ति योग क्या है?   भक्ति योग- यह योग भावनाप्रधान और प्रेमी प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए

श्री कृष्ण ने द्रोपदी का चीर कैसे बढाया? panch pandav

श्री कृष्ण ने द्रोपदी का चीर कैसे बढाया?  Shri krishna ne dropadi ka chir kaise badaya?  panch pandav, द्रोपदी स्वयंवर द्रोपदी का जन्म कहा हुआ- द्रोपदी पांचाल राज्य मे हुआ   राजा द्रुपद कि पुत्री थी जिसका जन्म यज्ञ के हवन कुंड से हुआ था, इसी लिए द्रोपदी का एक नाम याज्ञशेनी भी था जब द्रोपदी का स्वयंवर हुआ तो उस स्वयंवर मे अंगराज कर्ण भी आये थे और हस्तिनापुर से राजकुमार दुर्योधन भी थे भेस बदलकर भिक्षा मागने कि इक्षा से आये हुए थे पांडव जव अंगराज कर्ण को अपमानित किया गया कि वे सूत पुत्र है फिर किसी से भी वह लक्ष्य भेद नही हुआ तव अर्जुन ने उस लक्ष्य भेद किया और स्वयंवर को जीत कर द्रोपदी को लेकर चले गयेे।  पांडवो कि माता के वो बचन जिनसे द्रोपदी पांचाली बनी और फिर जव अपनी माता के पास गये तो धर्मराज युधिष्ठिर ने माता से कहा कि हमे भिक्षा मे क्या मिला है देखा मॉ तो मॉता पूजा मे बैठी थी और मॉ ने कहा जोभी मिला है वह तुम पांचो आपस मे बांट लो फिर जब मॉता ने देखा कि अर्जुन ने स्वयंवर जीत कर द्रोपदी को लाये है तो वो मन मे ग्लानी करने लगी और कहा की मेरा बचन मत मानो लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि

गुरू क्या होता है क्या है गुरू शब्द का अर्थ? Guru kon kahlate hai,guru ji

क्या है गुरू महिमा ?  ,guru ji  Guru ji शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात दो अक्षरों से मिलकर बने 'गुरु' शब्द का अर्थ - प्रथम अक्षर 'गु का अर्थ- 'अंधकार' होता है जबकि दूसरे अक्षर 'रु' का अर्थ- 'उसको हटाने वाला' होता है। अर्थात   अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु वह है जो अज्ञान का निराकरण करता है अथवा गुरु वह है जो धर्म का मार्ग दिखाता है। श्री सद्गुरु आत्म-ज्योति पर पड़े हुए विधान को हटा देता है। ओशो कहते है गुरु के बारे में कि 'गुरु का अर्थ है- ऐसी मुक्त हो गई चेतनाएं, जो ठीक बुद्ध और कृष्ण जैसी हैं, लेकिन तुम्हारी जगह खड़ी हैं, तुम्हारे पास हैं। कुछ थो़ड़ा सा ऋण उनका बाकी है- शरीर का, उसके चुकने की प्रतीक्षा है। बहुत थोड़ा समय है।...गुरु एक पैराडॉक्स है, एक विरोधाभास है : वह तुम्हारे बीच और तुमसे बहुत दूर, वह तुम जैसा और तुम जैसा बिलकुल नह

ब्राह्मण कोन है? Brahman kon hai

ब्राह्मण कोन है?   brahman kon hai? कोन सा ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है ब्राह्मण कोन है? यह भी एक विवादास्पद विषय है। इस पर प्राचीन समय से चर्चा चली आ रही है कि ब्राह्मण जन्म से है अर्थात् अपने वंश कुल गौत्र से या अपने कर्म से।  हम लोग तो यही धारणा बना कर चलते हैं कि ब्राह्मण अपने जन्म कुल गौत्र से है, लेकिन आज समाज मे जीवन की विचार धारा में व पिछले पौराणिक ग्रन्थों में भी ब्राह्मण की विशेष परिभाषा दी है।    ब्राह्मण वो है जो ज्ञानी, है वेद मंत्रो, इश्वर की आराधना भजन पूजन का ध्यान रखता है, सत्य धर्म मे सदा बना रहता है, किसी का अहित नही सोचता, क्षमाशील, नम्रता, तप आदि गुणो से सम्पन्न है वही ब्राह्मण है।  यजुर्वेद अध्याय ३१-मंत्र ११ मे कहा है लोकानाम तु विवृद्धयर्थ मुख बाहु रूपादाः ब्राह्मण क्षेत्रियं वैश्यं शूद्रं च न्यवर्तयत।  अर्थात- संसार की उत्पत्ति के लिए ईश्वर के मुख, भुजा, पेट, तथा पैर से चार वर्ण पैदा हुये। सृष्टिकर्ता ईश्वर के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, पेट से वैश्य, और पैरो से शुद्र, एेसे चार वर्ण पैदा ।  चूंकि मुख अति पवित्र होता है इसी लिए ब्राह्मण को सब वर्णो मे श्रेष्ठ

पांडवो का अज्ञात वास कैसे और कहा पूरा हुआ? Pandavo ka agyatavaas kaise pura hua pandavas

पांडवो का अज्ञात वास कैसे और कहा पूरा हुआ? pandavas पांडवो का अज्ञात वास द्युत क्रीडा कौरवो और पांडवों के बिच द्युत क्रीडा मे कौरवो ने पांडवो को छल से हराया और उन्हें तेहरा वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञात वास पूरा करना था।  अज्ञात वास कि सर्त थी कि अगर अज्ञात वास के बीच पकडे गये तो दोवारा तेहरा वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञात वास पुरा करना होगा वनवास के वीच भगवान श्री कृष्ण पांडवो से मिलने आया करते थे और श्री कृष्ण का तो अर्जुन और द्रोपदी से विशेष संबंध था अर्जुन श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा के पति थे और द्रोपदी श्री कृष्ण की शखी थी। और श्री कृष्ण द्रोपदी के सखा भगवान अपने भक्तो का अज्ञात वास मे भी ख्याल रखते है।  तेहरा वर्ष का वनवास पूरा होने के बाद जब एक वर्ष का अज्ञात वास बचा तब पांडवो ने अज्ञात वास के लिए विराट नगर चुना और वहा विराट राज कि सेवा मे एक वर्ष तक रहे  उस एक वर्ष मे बीच कौरवो ने हर राज्य मे पांडवो को खोजा पर पांडव कही भी नहीं मिले तब अंत में विराट रीज बचा था वाहा का सेना पति कीचक कौरव ज्येष्ठ दुर्योधन का मित्र था पहले दुर्योधन ने अपने मित्र से कहा की मेरी सहायता करो औ